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अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ निहत्थे लड़ने वाले भारतीय स्वतंत्रता सेनानी वीर शहीद बूचा कोरकू का जन्म ग्राम बंजारीढाल तहसील शाहपुर जिला बैतूल में गरीब आदिवासी परिवार में हुआ था। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी गंजनसिंह कोरकू के नेतृत्व में वर्ष 1930 के जंगल सत्याग्रह में भाग लिया था।
जंगल सत्याग्रह का उद्देश्य क्या था?
जंगल सत्याग्रह का मकसद था, ब्रिटिश सरकार के बनाए वन कानूनों का विरोध करना और आदिवासियों और स्थानीय लोगों के अधिकारों की मांग करना। बैतूल जिले के आदिवासी गांवो की जनता ने इस सत्याग्रह में राष्ट्रीयता की भावना के साथ सक्रियता से भाग लिया। बूचा कोरकू भी इस आन्दोलन के दौरान सक्रियता से भाग ले रहे थे। बंजारीढाल और सातलदेही गांवो के बीच गजन सिंह कोरकू एक आम सभा का आयोजन आदिवासियों को प्रेरित करने के लिये किये थे। जिसकी जानकारी पुलिस बल को लग गई और वह गंजन सिंह कोरकू को गिरफ्तार करने सभा स्थल पहुँच गई, जिस भर यहां मौजूद आदिवासी जनता ने प्रतिकार स्वरूप अंग्रेज पुलिस अधिकारियों को पीटना शुरू कर दिया। पहले तो पुलिस वाले वहां भाग गये । फिर 2 दिन बाद पुनः गांव पहुँच गये और वहीं पर बूचा कोरकू की मौजूदगी में गोलीबारी हुई, जिसमे यह घायल हो गये। 12-13 साल के रहे उनके बेटे दुकाडी ने उनकी मरहम पट्टी की परन्तु गोली का घाव तो भरने से रहा। नवम्बर, 1930 को बूचा कोरकू को गिरफ्तार कर घायल अवस्था में ही पहले बैतूल फिर रायपुर जेल भेज दिया गया। उनके रायपुर पहुँचने के 1 सप्ताह बाद ही शाहपुर थाने मे बूचा कोरकू की मृत्यु की खबर आ गई उनकी पगड़ी और धोती बेटे दुकाड़ी के घर पहुँचा दी गई। इसके बाद यद्यपि उनके परिवार की गुजर बसर अत्यन्त कठिनता से हुई फिर भी दुकाड़ी अपने पिता की शहादत को स्वतन्त्रता संग्राम में योगदान मानते हैं।
जंगल सत्याग्रह-सन् 1930 में जब महात्मा गांधी ने दाण्डी मार्च कर नमक सत्याग्रह शुरू किया था, तब सिवनी के कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने दुर्गाशंकर मेहता के नेतृत्व में जंगल सत्याग्रह चलाया। सिवनी से 9-10 मील दूर सरकारी चन्दन बगीचों के जंगलों में घास काटकर यह सत्याग्रह किया जा रहा था। इसी सिलसिले में 9 अक्टूबर, 1930 की सिवनी जिले के ग्राम दुरिया में सत्याग्रह की तारीख निश्चित हुई। पुलिस दरोगा ओर रेंजर ने सत्याग्रहियों का समर्थन करने आये जनसम्प्रदाय के साथ बहुत अभद्र व्यवहार किया जिससे जनता उत्तेजित हो उठी। सिवनी के डिप्टी कमिश्नर के इस हुक्म पर कि ‘टीच देम ए लेसन’, पुलिस ने गोली चला दी। घटनास्थल पर ही तीन आदिवासी महिलाएँ व एक पुरुष शहीद हो गए। इस घटना से मध्य प्रदेश के गिरिजन समुदाय में भी स्वतन्त्रता की ज्योति प्रज्ज्वलित होने का पुष्ट प्रमाण मिलता है। इन शहीदों के शवों को भी उनके परिवारजनों को अन्तिम संस्कार के लिए नहीं दिया गया।
:राकेश देवडे़ बिरसावादी
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