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मध्यकालीन भारत का इतिहास हम खंगाले तो इतिहास में आदिवासी समाज के साथ सौतेला व्यवहार किया गया है, उस समय के इतिहासकारों द्वारा आदिवासी समुदाय के ऊपर कुछ भी नहीं लिखा गया किंतु कुछ निर्भीक निडर साहसी पराक्रमी आदिवासी राजाओं द्वारा समृद्ध रीति रिवाज और मौखिक परंपरा को संरक्षित करके रखा गया था।ऐसे ही ओंकारेश्वर के एक पराक्रमी राजा थे नत्थू भील।खंडवा जिले के मान्धाता, ओंकारेश्वर पर 18वी सदी में ब्रिटिश हुकूमत के ठीक पहले 8वी से 12वी सदी तक भील राजाओं ने राज किया फिर षणयंत्रपूर्वक बाहरी आक्रमणकारियों ने छल कपट से यहां के राजाओं की जल जंगल जमीन पर कब्जा कर लिया। आदिवासी भील राजा नत्थू भील से संबंधित भ्रामक तथा अप्रमाणिक जानकारी गूगल पर उपलब्ध है लेकिन मैं उससे सहमत नहीं हूं ना ही मेरा समाज सहमत होगा।आदिवासी राजा नत्थू भील की वास्तविक जानकारी बताई ही नहीं गई है बल्कि गोलमोल आधी अधूरी जानकारी है ताकि आम पाठक भ्रमित अवस्था में रहे और आने वाली पीढ़ी अपने पुरखों को लेकर कोई प्रश्न खड़ा ना कर सके। आदिवासी समुदाय के बुद्धिजीवियों का कहना है ओंकारेश्वर में आचार्य शंकराचार्य की 108 फीट ऊंची मूर्ति की जगह स्कूल ,कालेज ,युनिवर्सिटी बनना था या नत्थू भील की मूर्ति लगना चाहिए था,यह सरासर आदिवासी समाज के साथ साथ संपूर्ण निमाड़ के साथ अन्याय है।पूर्वी /पश्चिमी निमाड़ भी ओंकारेश्वर में स्कूल ,कालेज युनिवर्सिटी बनते देखना चाहता ताकि देश का युवा शिक्षित होकर आगे बढ़े और एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण हो सके।महान दार्शनिक एवं धर्मप्रवर्तक आदि शंकराचार्य जी का हम सम्मान करते हैं, उनका जन्म केरल के ग्राम कालडी़ में हुआ था।कायदे से उनकी मूर्ति भारत के सबसे शिक्षित राज्य केरल में लगना चाहिए थी लेकिन सरकार द्वारा केरल में जन्मे आदि शंकराचार्य की 108 फीट ऊंची मूर्ति 2100 करोड़ रुपए खर्च करके आदिवासी भील राजा 'नत्थू भील' की धरती ओंकारेश्वर (मध्यप्रदेश) में लगाई जाना समझ से परे है।
(सामाजिक कार्यकर्ता,लेखक, आदिवासी विश्लेषक)
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