पहले आमुस के सामने शांति सेना थी अब जयस के सामने जनजाति मंच है।✍️ राकेश देवडे़ बिरसावादी



क्रांतिकारी जोहार,जय बिरसा,आपकी जय..... 

🌱💪✊🏹🏹👏✊✊🌱🍃🍂🌱

मैंने आमुस और जयस का तुलनात्मक अध्ययन करने के उपरांत महसूस किया कि जिस संगठन के आखिरी में 'स' रहता है, वाकई वह उत्कृष्ट व दमदार संगठन होता है।खैर यह 'स'वाली बात गैर प्रमाणिक है ,मेरे व्यक्तिगत मन का भाव है।दोनो संगठन स्वयं में श्रेष्ठ है। आमुस से जयस की तुलना करना सूरज को आईना दिखाने जैसा है। पुराने समय में पुरखों के संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए जल जंगल जमीन और शोषण अत्याचार के खिलाफ आदिवासी मुक्ति संगठन ने संगठित होकर वर्तमान समय के काले अंग्रेजो और उनके द्वारा आदिवासी विरोधी नीतियों के खिलाफ दमदारी से संघर्ष किया था, वहीं दूसरी ओर समाज की अंतिम सांस जयस द्वारा संघर्ष किया जा रहा है। दोनों ही संगठनों द्वारा किए गए सकारात्मक कार्यों के दौरान बहुत सारी समस्याएं भी निर्मित हुई। दुश्मन से लड़ाई चल रही है, दुश्मन से जीते या हारे यह भविष्य का सवाल था लेकिन उक्त दोनों ही संगठनों के सामने महत्वपूर्ण संकट अपनों से लड़ाई का प्रादुर्भाव हुआ है । दुश्मन की टीम में हमारे समाज का सेनापति खड़ा है और समाज के सामूहिक निर्णय का विरोध करता है। समाज के समतुल्य संगठन बनाकर सामूहिक निर्णय वाले संगठन का विरोध कर रहा है।जिस प्रकार पहले आदिवासी मुक्ति संगठन को तोड़ने के लिए 'शांति सेना' बनी थी, ठीक उसी तरह जयस को तोड़ने के लिए जनजाति मंच बना है। आदिवासी समुदाय के अलावा दूसरे समाज के लोगों का हस्तक्षेप पहले भी था और अब भी है। 

पहले .............
"आदिवासी समाज का जमीनी स्तर का संगठन आदिवासी मुक्ति संगठन मध्यप्रदेश (आमुस) ध्येय वाक्य:आमरा गांव मा आमरौ राज, आमुस के नेतृत्व में कई बड़े-बड़े आंदोलन किए जाते थे, आमुस सड़क पर उतरकर जल जंगल जमीन की लड़ाई लड़ता था, आमुस द्वारा सरकार की आंख में आंख डालकर सवाल जवाब किया जाता था सरकार में बैठे लोग आमुस से थरथर कांपते थे। सत्ता की कुर्सी को हिला कर रखने वाला संगठन था। आदिवासी मुक्ति संगठन की पहली बैठक झिरिजामली में हुई थी और आदिवासी मुक्ति संगठन के पहले अध्यक्ष स्वर्गीय वनराज सिंगोरिया  1993 से 2003 तक आमूस के  अध्यक्ष रहे, जिन्होंने दिल्ली में आमरा गांव मा आमरौ राज , गांव गणराज्य के लिए 21 दिन तक आमरण अनशन पर बैठे।आमुस में छोटे बच्चे से लेकर बुढ़े तक सभी क्रांतिकारी आदिवासी उलगुलान करते थे ,करते हैं और करते रहेंगे। हमारे बाप दादाओ ने इस संगठन के माध्यम से समाज को लड़ना सिखाया।चालू छै भाई चालू छै आमरी लडा़ई चालू छै"

अब............
जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) ....समाज की आखिरी उम्मीद... समाज रूपी शरीर में बहने वाला जयस रूपी क्रांतिकारी खून......समाज का संगठन नहीं बल्कि समाज पर हो रहे शोषण अत्याचार से निकली हुई चीख और पुकार पर टंट्या भील दादा की स्पीड से पीड़ित व्यक्ति के पास पहुंच कर उसका दुख दर्द जानकर उसके खिलाफ पूरी दमदारी के साथ आवाज बुलंद करने वाली पुरखों की अदृश्य शक्ति है....जयस वैचारिक महाविद्यालय है जहां युवा प्रशिक्षित होकर समाज पर हो रहे शोषण और अत्याचार के खिलाफ दहाड़ते है।जय जोहार का नारा है भारत देश हमारा है।

_लेकिन............._

जल जंगल जमीन के संघर्ष में आमुस के नेतृत्व में भगवानपुरा क्षेत्रांतर्गत काबरी डाबरी  आंदोलन चल रहा था। यह मान कर चलो उस समय आमुस के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था। इस आंदोलन को कमजोर करने के लिए पूर्व उपमुख्यमंत्री सुभाष यादव ने शांति सेना बना ली। आमुस और शांति सेना में लोग हमारे ही। लेकिन दोनों ही एक दूसरे के विरोधी।दोनों को आपस में लड़वा दिया। नतीजा यह हुआ कि 3 लोग मारे गए और कई लोगों की गिरफ्तारियां हुई। समाज का उपयोग करके जिसको अपनी राजनीति चमकाना था उन्होंने अपनी राजनीति चमका ली। खैर मां प्रकृति तथा आदिवासी पुरखों के आशीर्वाद से आदिवासी मुक्ति संगठन आज भी अपनी ऐतिहासिक क्रांतिकारी विरासत लिए जिंदा है और शांति सेना का अस्तित्व समाप्त हो गया। ठीक वैसे ही वर्तमान समय में हो रहा है जयस और जनजाति मंच में युवा आदिवासी समुदाय के ही हैं लेकिन दोनों एक दूसरे के कट्टर विरोधी। एक पक्ष आदिवासी समुदाय को आदिवासी कहना चाहता है तो दूसरा पक्ष आदिवासी समुदाय को जनजाति कह रहा है। जयस युवाओं द्वारा रात दिन भूखे प्यासे रहकर गांव गांव जाकर क्रांति की मशाल जलाई गई, समाज को जागृत करने के लिए कई अनगिनत युवाओं ने अपना कैरियर और जवानी दांव पर लगा दी। कई अधिकारी कर्मचारी राजनितिक ताकत से इधर-उधर ट्रांसफर किए गए। बरसों से छुपा कर रखे गए इतिहास को समाज के सामने लाकर रख दिया। एक समय ऐसा था जब सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा टंट्या भील बिरसा मुंडा की फोटो रखकर विचार-विमर्श किया जाता था तब राजनीतिक लालसा रखने वाले लोगो द्वारा हंसी उड़ाई जाती थी। वह कहते थे डाकू चोर लुटेरों की फोटो पर माल्यार्पण कर रहे हैं। जयस युवाओं की मेहनत ने इन्हीं सच्चे स्वतंत्रता सेनानियों को भगवान कहने पर मजबूर कर दिया। समाज के युवाओं द्वारा की गई मेहनत से बाहर आई पुरखों की तस्वीरों को सामने रखकर तथाकथित संगठनों द्वारा पुरखों के इतिहास को कॉपी पेस्ट करके त्रुटिपूर्ण तरीके से गैर प्रमाणिक तथ्यों के साथ एडिट करके आदिवासी समुदाय के सामने परोसा जा रहा है। हमारे लिखे गीतों को उनकी रैलियों में बजाया जा रहा है। हमें सोचकर हंसी आती है जहां एक ओर हमने समाज के युवाओं को प्रशिक्षित करके सामाजिक क्षेत्र में पीएचडी करवा दी है और तुम बबुआ समाज के युवाओं को पहली कक्षा में दाखिला दिलवा रहे हो। जयस युवाओं का मानना है आदिवासी आदिकाल से इस धरती पर निवास करने वाला पहला व्यक्ति,मूल बीज मूल वंश है, जनजाति नहीं,वनवासी नहीं, आदिवासी है हम , इस देश के मूल वासी हैं। जनजाति शब्द देश आजाद होने के बाद वर्ष 1950 में संविधान में रखा गया था। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा था आदिवासी इस देश के मूल मालिक है। जनजाति मंच वाले भाई
जयस को अपमानजनक अपशब्द कह रहे हैं जो कि निंदनीय है। जयस युवाओं को तकलीफ दुश्मन से नहीं है तकलीफ इस बात की है कि हमारे सामने हमारा ही भाई हमारे खिलाफ खड़ा है। खैर जयस अहिंसक शांतिप्रिय निसर्ग वादी प्रकृति प्रेमी संगठन है। और संवैधानिक दायरे में रहकर सतत काम कर रहा है। काम करने के दौरान अड़चनें तो आएगी लेकिन इनसे घबराना नहीं है। असली बचेगा नकली जाएगा। मां प्रकृति सबका हिसाब बराबर करती है। विश्व के आदिवासी एक हो, शांति अमन चैन और भाईचारा स्थापित करके मिलजुल कर रहो। लूटने वाला जाएगा कमाने वाला खाएगा नया जमाना आएगा।
✍️ राकेश देवडे़ बिरसावादी 

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ