जयस अहिंसक है , दुश्मन के दिमाग की उपज षड्यंत्रकारी घटना

बेतूल घटना पर विशेष:
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बेईमान विजय माल्या जैसे खूंखार डाकुओं को सरकार पकड़ नहीं पाती है लेकिन शांति पूर्ण रुप से सामाजिक आंदोलन कर रहे युवाओं को पकड़कर पहले अर्धनग्न किया जाता है फिर पूरी इमानदार के साथ गूगल पर सर्च करके अलग-अलग धाराओं में फंसा कर जेल में डाला जाता है, यह सिर्फ आदिवासी समाज के युवाओं के साथ ही होता है बाकी दूसरे संगठन के लोगों के साथ यह नहीं होता है, क्योंकि उन्होंने देव पर के दाने खा रखे हैं , वैसे आदिवासी समाज अहिंसक निसर्ग वादी शांतिप्रिय समाज होता है हम हिंसा में विश्वास नहीं करते , यह बात अलग है कि "शांतिपूर्ण आंदोलन मैं दुश्मन आकर आग लगा दे, नाम आंदोलन में शामिल लोगों का होगा" , जिन लोगों को सम्माननीय पुलिस प्रशासन ने जेल भिजवाया है वह लोग सभी शांत प्रवृत्ति के लोग हैं उन्होंने जन्म से लेकर आज तक कभी हिंसा नहीं की ,हो सकता है पुलिस प्रशासन के अंधेरे कैमरे में पकड़ा गए हो। हमने सुना है आंदोलन कर रहे लोगों ने पुलिस विभाग पर पथराव किया बिल्कुल गलत है उनको ऐसा नहीं करना था मुझे मेरे समाज के युवाओं पर पूरा भरोसा है वह ऐसा नहीं कर सकते हो सकता है आंदोलन को खंडित करने के लिए किसी दुश्मन ने ऐसा प्लान किया हो। 32 युवाओं में शामिल एक युवा मनोज शाह उईके जो काफी समझदार और इंटेलिजेंट युवा है वह हमेशा मेरे सामने पुलिस प्रशासन की तारीफ करता है उसकी सोच विराट है वह कहता है भैया आदिवासी समाज ही नहीं गैर आदिवासी समाज के लोग भी बहुत गरीब होते हैं हमें उन भाइयों के लिए भी संघर्ष करना होगा मैंने कहा बिल्कुल। उसको गिरफ्तार किया वह ठीक है आंदोलन में शामिल था लेकिन उसके पिताजी को भी गिरफ्तार कर लिया गया यह कहां का न्याय है? दुख तब होता है जब बलात्कार चोरी डकैती करने वाला नेता का लड़का खुलेआम घूमता है पुलिस फरार है करके गिरफ्तार नहीं करती वहीं दूसरी ओर सामाजिक आंदोलन कर रहे युवाओं को गिरफ्तार कर नंगा करके जेल भिजवाया गया, यह दोगला व्यवहार बिल्कुल गलत है। सुप्रीम कोर्ट के वकील कमलेश्वर डोडियार जी से बैतूल जाने के दौरान चर्चा हुई उन्होंने कहा- " 32 लोगों की पैरवी मैं करूंगा और उनको न्याय दिलाने का काम करेंगे।" 
आदिवासी समाज के पुरखों (धरती आबा बिरसा मुंडा , टंट्या भील, रेंगू दादा, भीमा नायक) को भी गोरे अंग्रेजों से लड़ाई लड़ने के दौरान जेल में रखा जाता था यह हमारे लिए आम बात है, हम आदिवासियों के डीएनए में जेल व्यवहारिक है , भारत के कई राज्यों में ऐसे बहुत सारे आदिवासी लोग हैं जो बिना मुकदमे के जेल में जबरन सडा़ए जा रहे है, कुछ समय पूर्व एक मानसिक गुलाम सांसद के खिलाफ फेसबुक पर टिप्पणी करने पर बड़वानी जिले के एक युवा को जबरन जेल पहुंचा दिया गया था , बस्तर के गांवों में रहने वाले कई निर्दोष आदिवासियों को पुलिस नक्सली बताकर जेल में डाल देती है, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि 90 प्रतिशत से अधिक लोग निचली अदालत में ही बेकसूर साबित होते हैं, लेकिन जब तक ये लोग छूटते हैं तब तक इनकी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा जेल में बरबाद हो चुका होता। इसकी सबसे बड़ी शिकार हैं आदिवासी महिलाएं।सत्रह साल की एक आदिवासी लड़की मंजू (नाम बदला हुआ) 2008 में नक्सलियों के साथ मिलकर छत्तीसगढ़ के एक गांव पर हमला करने के आरोप में गिरफ्तार की गई, लेकिन पुलिस के पास इसके खिलाफ न तो कोई सबूत था और न ही कोई गवाह अदालत में पेश किया जा सका। फिर भी सात साल तक इस लड़की को जेल में रहना पड़ा और इस साल मार्च में वो निचली अदालत से लड़की बेकसूर साबित हुई है।हम आदिवासियों को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन एक बात साफ है पहले गोरे अंग्रेजों से आदिवासी लड़े अब काले अप्रवासी अंग्रेजों से। कुछ घटिया राजनीतिक स्वार्थ के लोगों ने आंदोलन में बिन बुलाए मेहमान की तरह अपना उल्लू सीधा करने के लिए जबरन शामिल होकर आंदोलन को लक्ष्य से भटका दिया। तथाकथित राजनीतिक दलों के लोगों को सामाजिक आंदोलनों से भगाना चाहिए क्योंकि मैं मानता हूं राजनीतिक दलों के लोगों की वजह से, उनके घटिया बयानों की वजह से सामाजिक कार्यकर्ताओं पर एफ आई आर होती हैं, उनको जेल भिजवाया जाता है। आदिवासी समाज के 32 युवाओं को जेल में डाला जाता है और आदिवासी समाज के सांसद विधायक मौन रहते हैं इससे बड़ा धोखा और क्या हो सकता है? क्या यह सारे विधायक सांसद पेपर नहीं पड़ते हैं या फिर सब अनपढ़ है? चलो जो भी हो आगामी वर्ष 2023 में चुनाव है, सब का स्कोर कार्ड तैयार रखना। आदिवासी समाज के कई बड़े आंदोलन हुए लेकिन आंदोलनों की कमान अच्छे लोगों के हाथों में थी जिससे तथाकथित दुश्मन कोई भी गड़बड़ी नहीं कर पाया। लेकिन बेतूल में हमारा दुश्मन कामयाब हुआ। अंत में समस्त सामाजिक कार्यकर्ताओं से यही अपील करना चाहूंगा की जो भी आंदोलन हो शांतिपूर्ण हो अहिंसक हो अनुशासित हो, यदि दुश्मन किसी प्रकार का कोई षड्यंत्र रास्ता है तो उसका भी प्रबंध हो।
सामाजिक कार्यकर्ताओं पर निम्नलिखित धाराओं में प्रकरण दर्ज किया गया है जो इस प्रकार है:- 
धारा 147, 148:
 आईपीसी की धारा - 147, 148
भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147 और 148 के अनुसार, अगर कोई भीड़ में शामिल होकर हिंसा करता है और वो उपद्रव करने का दोषी है, तो उसे 2 से 3 साल की अवधि के लिए कारावास की सजा का प्रावधान है. जिसे दो वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है. या आर्थिक जुर्माना या फिर दोनों ही लगाया जा सकता है।

धारा 149: आईपीसी की धारा- 149

भारतीय दंड संहिता की धारा 149 के अनुसार, अगर कानून के खिलाफ जनसमूह में शामिल कोई व्यक्ति या सदस्य किसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए कोई अपराध करता है, या कोई ऐसा अपराध किया जाता है, जिसे उस जनसमूह के सदस्य जानते थे, तो उसमें शामिल हर व्यक्ति उस अपराध का दोषी होगा।

धारा 341: 
आईपीसी की धारा-341 के अनुसार अगर कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को गलत तरीके से रोकता है तो उसे एक महीने तक की जेल की सजा या 500 रुपये का आर्थिक दंड अथना दोनों से दंडित किया जा सकता है। यह एक जमानती और संज्ञेय अपराध है और किसी भी न्यायिक अदालत में इस पर सुनवाई हो सकती है।

धारा 353: 
आईपीसी धारा 353: लोक सेवक को अपने कर्तव्य के निर्वहन से भयोपरत करने के लिए हमला या आपराधिक बल का प्रयोग।

धारा 332: 
भारतीय दंड संहिता की धारा 332 के अनुसार, जो भी कोई किसी लोक सेवक को, उस समय जब वह लोक सेवक के नाते अपने कर्तव्य का निर्वहन कर रहा हो अथवा इस आशय से कि उस व्यक्ति को या किसी अन्य लोक सेवक को, लोक सेवक के नाते अपने कर्तव्य के निर्वहन, अथवा लोक सेवक के नाते उस व्यक्ति द्वारा अपने कर्तव्य के विधिपूर्ण निर्वहन में की गई । शासकीय कार्य में बाधा।

धारा 336: 

जो कोई इतने उतावलेपन या उपेक्षा से कोई कार्य करेगा कि उससे मानव जीवन या दूसरों का वैयक्तिक क्षेम संकटापन्न होता हो, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो ढाई सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।
खैर , जो कुछ भी हुआ लेकिन गलत हुआ।

           : राकेश देवडे़ बिरसावादी

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