अंधविश्वास या विज्ञान?

*_क्या वास्तव में पत्थर की बनी मूर्ति पानी और दूध पीती है? या अंधविश्वास है? वैज्ञानिक दृष्टिकोण क्या है? 21वीं सदी में अंधविश्वास को कौन बढ़ावा दे रहा है?_*
*_सगाजनों, आज आपने लगभग पांच राज्यों (बिहार, उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश) के शिव मंदिर की तरफ महिलाओं को पानी लेकर भागते हुए देखा होगा, कहीं से सूचना प्राप्त हुई की शिव मंदिर मैं स्थित पत्थर के नंदी पानी पीते हैं और देखते ही देखते पूरे भारत में हाहाकार मच गया, महिलाएं भावुक हो गई, शिव मंदिर में तांता लग गया ,भीड़ जमा हो गई, पढ़े-लिखे लोग वीडियो बनाकर वायरल कर रहे हैं, क्या वास्तव में पत्थर की मूर्ति पानी पीती है या कुछ और मसला है? धार्मिक आस्था के नाम पर विज्ञान को हम नहीं झुठला सकते। विज्ञान तो विज्ञान होता है। देश में अन्याय और अत्याचार लगातार बढ़ता जा रहा है चोरी डकैती के साथ - साथ छोटी-छोटी बच्चियों का बलात्कार हो रहा है, सरकारी अफसर रिश्वत ले रहा है, भ्रष्टाचार लगातार बढ़ रहा है, संविधान की शपथ लेकर नेता झूठ बोलता है, यानी कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति दिन प्रतिदिन पाप करते जा रहा है और भगवान से अपेक्षा यह रखते हैं कि वह कोई चमत्कार कर दे , यह बिल्कुल संभव नहीं है। पत्थर की मूर्ति के पानी पीने के पीछे आखिर सच क्या है ?_*
👉 *_पत्थर या संगमरमर की बनी मूर्ति द्वारा पानी  "पृष्ठ तनाव (SURFACE TENTION)"के कारण होता है यह कोई चमत्कार नहीं बल्कि विज्ञान का नियम है ।_* 
 👉 *_पत्थर या संगमरमर की बनी मूर्तियों में तमाम पोर्स या छोटे-छोटे छिद्र होते हैं जिससे लिक्विड अंदर की ओर सक (चूसना )हो जाता है, इन सकिंग पोर्स के पास कोई भी लिक्विड या दूध जब लाया जाता है तो वो इन्ही पोर्स से होता हुआ मूर्ति के अंदर चला जाता है और हम ये कहते हैं कि मूर्ति दूध/पानी पी रही है।_*
👉 *_गर्मी पड़ने के बाद ये वैक्युम पोर्स या सकिंग पोर्स एक्टिव हो जाते हैं, इसमें बाइनरी थ्योरम लागू होता है।_*
 👉 *_पृष्ठतनाव के कारण संगमरमर या पत्थर की मूर्तियों या फिर फर्श या दीवार के भीतर पतली दरार पड़ जाती है जिससे कभी-कभी दूध या पानी भीतर जाता है। मूर्ति दूध पीती नहीं है। जगह मिलते ही वहां किसी न किसी हिस्सा से बाहर निकलने लगता है।_*
👉 *_नेशनल अवार्ड प्राप्त विज्ञान प्रसारक सारिका घारू ने एक प्रयोग के जरिये किसी भी मूर्ति द्वारा दूध या पानी पीने की घटना की व्याख्या करते हुए बताया कि कोई भी प्रतिमा दूध नहीं पीती है। बल्कि द्रव्यों की गति, पृष्ठ तनाव, आसंजन और संबंद्धता जैसे भौतिक गुणों के कारण ऐसा प्रतीत होता है।_*
👉 *_पृष्ठ तनाव यानी सरफेस टेंशन द्रव्यों का वह गुण है जिससे वह अपने क्षेत्रफल को कम से कम बनाए रखने का प्रयास करता है। द्रव्यों के अंतरआणविक बल से उत्पन्न इस तनाव के कारण द्रव्य की ऊपरी परत इलास्टिक शीट की तरह व्यवहार करती है। अगर किसी बंद किए नल की टोंटी से टपकती बूंद को स्पर्श किया जाये तो वह सरक कर हाथ में आ जाती है। इसी प्रकार जब दूध से भरे चम्मच को किसी बाहर की ओर निकली आकृति वाली मूर्ति से स्पर्श किया जाता है तो दूध का पृष्ठ तनाव द्रव्य को ऊपर की ओर चम्मच से बाहर खींचता है। खिंचने के बाद गुरुत्वाकर्षण के कारण यह दूध मूर्ति से नीचे की ओर सरक जाता है। आस्था के कारण नीचे जाते दूध पर ध्यान नहीं जाता है।_*
👉 *_मध्यप्रदेश में भगवान भोलेनाथ, गणेश जी और नंदी महाराज की प्रतिमाएं जल और दूध पी रही हैं। अब इसे आस्था कहे या अंधविश्वास, चमत्कार कहे या फिर कोई वैज्ञानिक घटना। प्रदेशभर के मंदिरों में श्रद्धालुओं का तांता लग गया है। हर कोई भगवान की प्रतिमाओं को चम्मच से जल और दूध पिला रहा है। लोगों का दावा है कि मूर्ति के सामने पानी या दूध रखने पर वो पी रहे हैं। धार, खंडवा, बड़वानी, खरगोन और आसपास के दूसरे शहरों से भी इस तरह की खबरें सामने आ रही हैं। श्रद्धालुओं का दावा है कि मंदिर में भगवान की मूर्ति के सामने पानी या दूध रखते हैं तो वे पी रहे हैं। हालांकि एक्सपर्ट्स का मानना है कि गर्मी के दौरान पत्थरों में वैक्यूम पोर्च बन जाता है। इस वजह से प्रतिमाएं पानी पी रहीं हैं। गर्मियों में ऐसा आम है।_*
👉 *_खरगोन में पत्थर के बने  कछुए ने भी  पीया पानी_*
👉 *_ऐसे ही खरगोन के काकड़ वाले शिव मंदिर में बने कछुए की प्रतिमा भी पानी पी रही है। वहीं झिरन्या के शिव मंदिर में भगवान नंदी की प्रतिमाएं भी दूध का भोग कर रहीं हैं।_*
👉 *_सेंधवा के शासकीय पीजी कॉलेज में रसायन विभाग के प्रोफेसर महेश बाविस्कर का कहना है कि यह धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ प्रश्न है। बावजूद इसके, विज्ञान की दृष्टि से पत्थरों में वैक्यूम पोर्च(निर्वाद छिद्र) उत्पन्न हो जाते हैं और गर्मी के दौरान पानी का पृष्ठ तनाव भी कम हो जाता है। ऐसी स्थिति में ऐसा होना बिल्कुल सामान्य है। वहीं शासकीय पीजी कॉलेज के फिजिक्स के विभाग प्रमुख डॉक्टर बीडी श्रीवास्तव का कहना है कि भगवान की प्रतिमाएं पत्थर की होती हैं। पत्थर में बारीक-बारीक नलिकाएं होती हैं। पानी में सरफेस टेंशन के कारण पानी पत्थर की नलिकाओं में चला जाता है। यह वैज्ञानिक कारण सामने आया है।_*
👉  *_वैज्ञानिक स्पष्टीकरण घटना की व्याख्या करने की कोशिश करते हुए, रॉस मैकडॉवेल ने वैज्ञानिकों की टीम का नेतृत्व किया भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने नई दिल्ली के एक मंदिर की यात्रा की और एक दूध देने की पेशकश की, जिसमें खाद्य रंग । जैसे ही चम्मच में तरल का स्तर गिरा, वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि चम्मच से दूध गायब होने के बाद, यह उस प्रतिमा को लेप कर देता है जहां चम्मच रखा गया था। इस परिणाम के साथ, वैज्ञानिकों ने स्पष्टीकरण के रूप में केशिका क्रिया की पेशकश की; सतह तनाव दूध के तरल को चम्मच से ऊपर और बाहर खींच रहा था, इससे पहले कि गुरुत्वाकर्षण के कारण यह प्रतिमा के सामने भाग जाता है।_*
👉 *_केशिका क्रिया (कभी-कभी केशिका , केशिका गति , केशिका प्रभाव , या >wicking ) तरल की क्षमता है, जिसकी सहायता के बिना संकीर्ण रिक्त स्थान में प्रवाहित किया जा सकता है, या यहां तक कि गुरुत्वाकर्षण जैसी बाहरी ताकतें। प्रभाव एक पेंट-ब्रश के बाल के बीच तरल पदार्थ के ड्राइंग में देखा जा सकता है, एक पतली ट्यूब में, कागज और प्लास्टर जैसी झरझरा सामग्री में, कुछ गैर-झरझरा सामग्री जैसे कि रेत और द्रवीभूत कार्बन फाइबर में , या जैविक सेल में। यह तरल और आस-पास की ठोस सतहों के बीच इंटरमॉलिक्युलर बलों के कारण होता है। यदि ट्यूब का व्यास पर्याप्त रूप से छोटा है, तो सतह तनाव का संयोजन (जो तरल के भीतर सामंजस्य ) के कारण होता है और चिपकने वाला बल तरल के बीच और कंटेनर की दीवार तरल को फैलाने के लिए कार्य करती है।_*
👉 *_इस लेख का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति की धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाना  नहीं है, बल्कि 21वी सदी मैं विज्ञान के प्रति अभिरुचि जगाना है।_*


            ✍️ *राकेश देवडे़ बिरसावादी*

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