बचपन की यादें

बचपन की यादें : 
"जब खेती में काम करने के लिए नवीन बैलो को पिताजी ट्रैनिंग देते थे जिसे हमारी आदिवासी क्षेत्रीय भाषा में 'केवडा़ उलालना' कहते हैं,एक त्रिकोणीय लकड़ी जिसे हमारी क्षेत्रीय भाषा में 'डगाणा' कहते हैं,उसके पीछे बैठना मुझे बहुत पसंद था। गांव में बैलगाड़ी पर बैठना,साईकिल चलाना,पगडंडी चलना,मैले-कुचले-फटे कपड़े पहनना अच्छा लगता था। टूटे-फूटे कच्चे मकान में भी सकून मिलता था, गाय-बकरीयां चराते समय नंगे पैर, सागवान पत्तियों की छाता, खाकरे के पत्ते का दोना बनाकर उससे झीरी से पानी पीना, गिल्ली-डंडा, तीर-कमान, पहाड़ से फिसलना भी बेहत अच्छा लगता है।ज्वार-मक्का की राबड़ी, छाछ-मक्के की घाट, रजान और अमाड़ी की भाजी, सुखी मिर्ची, बाजरे की रोटी, प्याज की सब्जी, आम की चटनी, केकड़े की भुर्जी सकून से खाना इत्यादि सबकुछ मुझे याद है। धरती मां के हिसाब से चलने मे ही जीव-जगत को फायदा है अन्यथा तबाही का कहर झेलना होगा।"
 :राकेश देवडे़ बिरसावादी 🌿

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