जय जोहार
"जन्म से मृत्यु तक ना जाने कितने ही लालच जिंदगी की राहों में मिलेंगे लेकिन पुरखों की तरह जो बिका नहीं वह अपने लक्ष्य से कभी भटका नहीं। औसतन 60 वर्ष की जिंदगी में सभी पुरखों को समझ पाना, पढ़ पाना संभव नहीं दादा,सभी पुरखों को पढ़ने के लिए हमें पुनः आदिवासी समाज में जनम लेना पड़ेगा। यदि पुरखे भी वर्तमान समाजसेवियों की तरह बिक गये होते तो शायद 15 वी शताब्दी पूर्व ही जिंदा लाशों के रूप में दफन हो जाते,पन्द्रहवीं शताब्दी के बाद भी विचारों के रुप में जिंदा नहीं होते।उनकी निर्भीकता,निडरता,साहस, पराक्रम,बहादुरी के किस्से शायद इक्कीसवीं सदी के युवा पढ़ पाते।हमें भाड़े की सरकार और अस्थाई गैर नैतिकता वाले नेताओं के झूठे विचारो की बजाय हमारे समाज के शहीद पुरखों के विचार ही सदियों तक जिंदा रखेंगे।आदमी शारीरिक रुप से मर सकता है लेकिन विचार के रूप में व्यक्ति मरने के बाद भी सदियों तक जिंदा रहता है।"
:राकेश देवडे़ बिरसावादी
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