✍️ राकेश देवडे़ बिरसावादी
‘पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़, इससे तो चाकी भली, पीस खाए संसार।’
संत कबीरदास जी का यह दोहा जहां अंधविश्वास पर प्रहार करता है तो वहीं, इस दोहे में अनाज पीसने वाली ‘घट्टी’ का भी अपना महत्व प्रतिपादित किया है।प्राचीन समय में पत्थर की लकड़ी के हत्थे लगी यह घटि्टयां हर घर में रहती थी। पूराने समय में जब बिजली से संचालित आटा या अनाज चक्की का आविष्कार नहीं हुआ था या बिजली की सुविधा नहीं थी। तब पत्थर से बनी इन घट्टियों का प्रचलन घरों-घर था। महिलाएं इन घट्टियों के माध्यम से ही अन्न पीसा करती थीं। इसमें अनाज पिसाई तो होती ही थी, साथ ही उनका व्यायाम भी होता था।
धीरे-धीरे समय के साथ यह घटि्टयां विलुप्त हो गईं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं-कहीं आटा चक्की या अन्य आधुनिक मशीनों के अभाव के चलते अभी भी इन घट्टियों का प्रचलन जारी है।
मुझे याद है जब मैं छोटा था तब मिट्टी के कवेलू वाला पूर्व दिशा की ओर बना हुआ मिट्टी की दीवारों से बना हुआ कच्चा मकान जिसके एक कमरे में पत्थर के दो पाटों से मिलकर बनी हुई "घट्टी" स्थापित थी जिसमें मेरी दादी तथा मेरी मां गोल गोल घुमा कर अनाज व दालों को दल (पीस) लिया करती थी, विशेषकर मोटा अनाज मक्का जिसे पीसकर घाट बनाई जाती है शाम के समय पीतल का मोटा पीतल या तांबे से बना बर्तन जिसे हांडु/हांडला/तांबणा कहते हैं , में मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ी की आंच पर पकाया जाता है फिर छाछ के साथ संयुक्त परिवार एक साथ बैठकर बड़े चाव से खाते थे।
आधुनिक दौर में अब भले ही नई पीढ़ी के लोग घट्टी यानि हाथ से आटा पीसने की चक्की के बारे में नहीं जानते हैं, लेकिन पुराने दौर में महिलाएं घर पर ही घट्टी से आटा पीसती थीं। अब इसका स्थान मशीनों ने ले लिया। हमारे घर में अपनी पुश्तैनी 120 साल पुरानी घट्टी को आज भी न सिर्फ संजो कर रखा है बल्कि उसका उपयोग दाल दलने और सत्तू बनाने में किया जाता है। घट्टी का वजन करीब 60 किलो है। गेहूं तो नहीं पीसते, लेकिन दाल इसमें दलते हैं और सत्तू बनाते हैं।
घट्टी में दले (पीसे हुए) अनाज का स्वाद बाजार की चक्की से पिसे अनाज से अलग ही रहता है। यही कारण है कि आज भी इसका उपयोग पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है।
जब बिजली नहीं थी महिलाएं अपने घरों में ही पत्थर के पाटों से बनी इस हाथ की चक्की से गेहूूं और अनाज आदि पीस लिया करती थीं। हाथ की चक्की को गांव की भाषा में ‘चाखी’ तो कहीं ‘जाता’ तो कहीं कहीं क्षेत्र के अनुसार अपनी बोली में अलग नाम से बोला जाता था।_*
टांकना भी जरूरी है:
आटा जब पिसने में मोटा हो जाता है तब चक्की को एक अंतराल के बाद ऊपर वाले पाट को छेनी-हथौड़ी से टांकना भी पड़ता है। इससे वह पहले की तरह काम करने लगती है।
आदिवासी एकता परिषद के सांस्कृतिक महा सम्मेलन में शामिल होने में राजस्थान गया था तब वहां घट्टी बनाने वाले एक कारीगर से मुलाकात हुई थी, उस भाई ने बताया करीब 600 की जनसंख्या वाला पूरा ग्राम ही इस कार्य में लगा हुआ है।छैनी-हथौड़े से काम करने पर हाथ के पंजे व अंगुलियों में घाव हो जाते हैं। यह घटि्टयां 150 से 200 रुपए प्रति नग के हिसाब से बेची जाती है।एक घट्टी बेचने पर बमुश्किल 50 रुपए बचते हैं, जिससे हमें पेट भर भोजन भी नहीं मिल पाता है। किसी दिन खाना नहीं मिल पाता तो बच्चे भीख मांगकर ले आते हैं। घट्टी बनाने वाले कारीगरों ने बताया कि राजस्थान में खेती कम है। इसलिए उधर घटि्टयां कोई नहीं लेता है। मप्र व गुजरात में बारिश पश्चात हम घटि्टयां बेचने निकल जाते हैं।छगन पिता चंपाजी निवासी राजस्थान ने बताया कि हम 24 बड़े व छोटे बच्चे इस दल में शामिल है राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के भेरू खेड़ा ग्राम में रहते हैं,हम सभी जोगीनाथ समाज से संबंध रखते हैं हमारी पीढ़ियां पत्थर से घाटी बनाने का कार्य करती आ रही है।
मनावर प्रवास के दौरान सिंघाना रोड पर सीमा क्षेत्र से सटे एक मैदान में छन छन के आवाज बरबस ही आने जाने वालों का ध्यान आकर्षित कर रही थी वहां जाकर देखा तो करीब 20 महिला-पुरुष छेनी हथौड़ी की सहायता से कुछ पत्थरों की गोल आकृतियां काट रहे थे तो कुछ हथौड़ी की सहायता से घाटियों पर टांके लगा रहे थे इनमें से अधिकांश लोगों की अंगुलियां जख्मी थी इसके बावजूद सधे हुए हाथ छेनी हथौड़ी के माध्यम से घट्टी बनाकर अपनी जीविका चलाने में लगे हुए हैं और घट्टी जैसे देसी यंत्रों को अभी भी जीवित रखे हुए हैं।
यह तो साबित हो चुका है कि कई क़िस्म के अनाज और दालें उस समय के मुख्य भोजन थीं। लेकिन खानपान की शैली के सबसे रोचक साक्ष्य सिंधु घाटी की रसोइयां हैं। खुदाई में मिले अवशेषों से पता चला कि खाना पकाने के लिए बर्तनों और यंत्रों को पत्थर, धातु, लकड़ी और मिट्टी से बनाया जाता था।
मोहनजोदड़ो की खुदाई में उस ज़माने की रसोइयों में सिलबट्टे जैसी अवतल घट्टी मिलीं। ये घट्टी कठोर, कंकरीले और बलुआ पत्थर से बनाई जाती थीं। इनके ज़्यादा इस्तेमाल के संकेत यह बताते हैं कि अनाज कूटने या पीसने के लिए ये एकमात्र साधन थीं। इन घट्टियो के तल नीचे से गोलाकार हैं, इससे अनुमान लगा कि इन्हें जमीन में धंसा कर रखा जाता होगा, ताकि इन्हें हिलने से रोका जा सके। यह निष्कर्ष भी निकाला गया कि गेहूं और जौ को पीसकर ही पकाते और खाते थे।
प्राचीन समय में हमारे आदिवासी पुरखे घट्टी जैसे देसी यंत्र का उपयोग करते थे और उसमें दला हुआ अनाज खाकर लंबे समय तक जीवित रहते थे लेकिन वर्तमान समय में आधुनिक संसाधन उपलब्ध होने के बाद भी उम्र कम हो गई है। आप सोच रहे होंगे यह कैसी बात है लेकिन चिंतन मनन जरूर करे ।
✍️ राकेश देवडे़ बिरसावादी जयस बिरसा ब्रिगेड
(यह लेखक के निजी विचार है लेखक सामाजिक कार्यकर्ता व सामाजिक चिंतक हैं। )
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