भोरिया...... आदिवासी समुदाय की पहचान

#आदिवासी समाज की पहचान भोरियु......जय जोहार 
हमारे पुरखाओ के समय से चली आ रही हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है ,रहेगा!
💢अगर ये आपके हाथ में है तो मुझे नही लगता आपको किसी और हथियार की जरूरत पड़ सकती है,शायद इसीलिए हमारे पुरखो ने इसकी डिजाइन भी उसी तरह रखी थी!
💢आजकल उसकी डिजाइन बदलने की कोशिश की जा रही है!लेकिन ध्यान रहे संस्कृति के साथ छेड़ छाड़ नही!💢हमारी शान,आदिवासी की पहचान है।
महिलाओं की तरह पुरूषों को भी गहनों से खासा लगाव रहा है। पुराने दिनों में पुरूष भी महिलाओं की तरह ही सोने चांदी के गहने पहनते थे। जिसका प्रमाण हमें आज भी बस्तर में देखने को मिलता है। यहां के आदिवासी समाज के पुरूषों में महिलाओं की तरह, कान , गले, हाथ, पैर जैसे अंगों में महिलाओं की तरह ही सोने चांदी के आभूषण पहनने की आदिम परंपरा रही है। पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव के कारण, अब बस्तर के नौजवानों को अपने पूर्वजों की तरह गहनों से कोई खास लगाव नहीं रहा। धीरे धीरे बस्तर से भी पुरूषों द्वारा पहने जाने वाले परंपरागत आभूषण लूप्त होते जा रहे है। किसी खास आयोजन पर ही पुराने बुढ़े बुजुर्ग ही सोने चांदी के गहने पहने हुये दिख जाते है। केशकाल के भंगाराम जातरा में पुरूषों द्वारा पहने जाने वाले गहनों की खोज में बहुत कुछ नया मिला। 
यहां मैने कुछ बुजुर्गो के हाथों में चांदी के कड़े देखे जो कि पुराने चांदी के सिक्को से बने हुये थे। ये साधारण कड़े शुद्ध ठोस चांदी से बने हुये है। आजकल के लड़को में भी कड़े पहनने का फैशन है लेकिन सिर्फ तांबे या गिलट के ही। चांदी के कड़े बहुत पुराने समय से पहने जा रहे है। आज के समय जहां सिर्फ एक हाथ में ही कड़ा पहना जाता है वहीं पुराने समय में दोनो हाथो में कड़े पहने जाते थे। 
"भोरियु"💢आदिवासी कपटी कल भी नही था और भोला आज भी नही। 
" मारी संस्कृति,मारू अभिमान" #जोहार दी ब्रांड ऑफ #indigenous
बस्तर के आदिवासी पुरूषों के गहनो में कड़ा एक प्रमुख आभूषण रहा है जो आज सिर्फ बुजूर्गो के हाथो में दिखलाई पड़ता है। इन आभूषणों का चलन अब कम हो गया है जिसके कारण भविष्य ऐसे गहने पहनने वालों की सिर्फ फोटो ही एकमात्र प्रमाण होगी।
    :राकेश देवडे़ बिरसावादी 
(सामाजिक कार्यकर्ता एवं आदिवासी मुद्दों के विश्लेषक लेखक )


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